Nuclear Abolition News and Analysis

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‘We Are Suffering A Slow Motion Nuclear War’ – Hindi

हम एक धीमी गति के नाभिकीय युद्ध से जूझ रहे हैं

द्वारा जूलिओ गोडोय

बर्लिन (आईडीऐन) – राबर्ट जेकब्ज़ का जन्म आज से 53 वर्ष पूर्व हुआ था, जब शीत युद्ध अपने चरम पर था एवं मानव जाति के नाभिकीय विनाश का व्यामोह चहुं ओर व्याप्त था। उनके अनुसार जब वे मात्र 8 वर्ष के थे और स्कूल जाते थे – ‘हमें सिखाया गया कि किस प्रकार नाभिकीय हमले से अपनी रक्षा करनी है। हमें यह भी बताया गया कि ऐसे किसी भी हमले से बचने की कुंजी है इसके पहले चिन्हों को पहचान पाने में सटीक सतर्कता

आज 45 वर्ष बाद जेकब्ज़, जिन्हें उनके मित्र प्यार से बो पुकारते हैं, परिवारों व समुदायों पर रेडियोधर्मिता के सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभावों को पढ़ने-समझने वाले एक अग्रणी अनुसंधानकर्ता हैं। बो के पास इतिहास में पीएचडी है, उन्होने नाभिकीय मुद्दों पर 3 किताबें प्रकाशित की हैं एवं इसी विषय पर वे सैंकड़ों निबंध भी लिख चुके हैं। साथ ही वे हिरोशिमा नगर विश्वविद्यालय, जापान के ग्रेजुएट फ़ैकल्टी ऑफ अंतर्राष्ट्रीय स्टडीज़एवं पीस इन्स्टीच्यूटमें प्रोफेसर व अनुसंधानकर्ता हैं।

60 के दशक के आरंभिक वर्षों में स्कूल में जेकब्ज़ ने सीखा था नाभिकीय हमला होते ही सबसे पहली बात जो हम देखेंगे वह है विध्वंस की एक तेज़ रोशनी। अध्यापकों ने हमें सदा इस रोशनी के बारे में सतर्क रहने और छिप जाने की सलाह दी। मुझे याद है कि उस दिन घर जा कर मैं अपने शिकागो के उपनगरीय घर की सीढ़ियों पर घंटों बैठा रहा और उस रोशनी की प्रतीक्षा करता रहा

यह भयावह अनुभव जेकब्ज़ के जीवन का अहम भाग बन गया और इसी कारण उनकी पढ़ाई व पेशेवर जीवन मानव पर नाभिकीय काल के प्रभावों का आकलन करने की ओर मुड़ गए।

विश्च भर में भारी मात्रा में फैले रेडियोधर्मी व नाभिकीय पदार्थों के विषय में उनका कहना है “हम एक धीमी गति के नाभिकीय युद्ध से जूझ रहे हैं।” यह खतरनाक पदार्थ आने वाले हजारों वर्षों तक विश्व के पारस्थितिकीय तंत्र में मौजूद रहेंगे।

हिरोशिमा विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर के रूप में जेकब्ज़ अपना अधिकतर समय द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में नष्ट हुए इन दोनों शहरों (दूसरा नागासाकी) के बीच व्यतीत करते हैं। उन्हें इस त्रासदी के बाद समाज के सामाजिक व मानसिक प्रत्युत्तर को निकट से देखने का विशेषाधिकार प्राप्त हुआ; साथ ही फुकुशिमा की मार्च 2011 की नाभिकीय दुर्घटना ने उन्हें ऐसीआपदाओं के प्रतिसामाजिक, मनोवैज्ञानिकऔरनौकरशाही कीप्रतिक्रियाओंकाविश्लेषणकरनेका एक औरकष्टदायीअवसर प्रदान किया है।

आईडीऐनइनडेप्थन्यूज़ के सम्बद्ध संपादक जूलियो गोडोय ने प्रोफेसर जेकब्ज़ से ई-मेल ज़रिए बात की:

आईडीऐन: आपने किन कारणों से नाभिकीय विषयों पर आधारित अकादमिक करीयर चुना?

राबर्ट जेकब्ज़ (आरजे): नाभिकीय विषयों पर काम करने के करीयर को चुनने का मेरा कारण यह रहा कि मैं बचपन से ही नाभिकीय अस्त्रों से बहुत भयभीत था। जब मैं 8 वर्ष का था तो हमने स्कूल में सीखा कि नाभिकीय हमले से कैसे बचा जाता है। मुझे उसकी बारीकियाँ तो याद नहीं, परंतु इतना कह सकता हूँ कि यह कोई आम झुको और छुप जाओ वाला मामला तो नहीं था, पर कुछ वैसा सा ही था। हमें बताया गया कि बचने की कुंजी है इस हमले के बारे में सदा सतर्क रहना। ऐसे समय में जो पहली चीज़ हमें दिखाई देगी वह होगी विध्वंस की एक रोशनी। हमें बताया गया कि इस रोशनी पर सतर्क रहें और तुरंत छुप जाएँ। मुझे याद है कि उस दिन घर जा कर मैं अपने शिकागो के उपनगरीय घर की सीढ़ियों पर घंटों बैठा रहा और उस रोशनी की प्रतीक्षा करता रहा।

मुझे याद है कि उस रोशनी के बारे में सतर्कतापूर्वक इंतज़ार करते हुए मुझे लगा कि सड़क पार मेरा स्कूल मेरे आँखों के आगे ही पिघलता जा रहा है। मैं कल्पना कर रहा था कि गली के सारे घर व मेरा घर, सभी उस सफ़ेद रोशनी में पिघल रहे हैं और मैं बेहद डर गया। हालांकि इस भय का एक भाग इस संज्ञान से था कि एक दिन मैं भी मर जाऊंगा, पर एक अन्य बड़ा भाग नाभिकीय अस्त्रों के डर के कारण था। इस डर से निपटने के लिए मैंने पुस्तकलाय जा कर नाभिकीय अस्त्रों के बारे में अधिक से अधिक जानकारी हासिल करने की कोशिश की। क्योंकि मेरा डर इतना सशक्त था, मैंने स्वयं को डराने वाले इस वस्तु के विषय में हर चीज़ जानने का प्रयास जारी रखा। यह सीखना आज तक समाप्त नहीं हुआ है।

आईडीऐन: हिरोशिमा पीस इंस्टीच्यूट के एक स्टाफ सदस्य के तौर पर आपने हमारे इस दौर की एक सबसे विध्वंसकारी घटना को करीब से देखा है। फुकुशिमा सभी नाभिकीय बातों का एक भयानक उदाहरण बन कर उभरा है। तकनीक को नियंत्रित करने की कठिनाईयाँ, सरकारी व निजी दोनों प्रशासनों की लापरवाहियाँ और यह तथ्य कि रेडियोधर्मिता सीमाओं को नहीं पहचानती। आप इस दुर्घटना को कैसे देखते हैं?

आरजे: मेरे लिए यह घटना बेहद भयावह व सतत है। इस त्रासदी का कोई अंत दिखाई नहीं देता और रेडियोधर्मी कण दशकों तक प्रशांत महासागर में गिरते रहेंगे। मेरे ख्याल से इस घटना के पीछे कई लापरवाहियाँ रही हैं। साईट व रिएक्टरों का डिजाईन ही गलत था। रिएक्टर के रख-रखाव में दशकों तक लापरवाही हुई। आपतकालीन प्रक्रियाएँ कभी तैयार ही नहीं की गईं। इस प्रकार इस दुर्घटना ने न सिर्फ नाभिकीय ऊर्जा की बल्कि धानर्जन के लिए खड़े किए गए निजी नाभिकीय ऊर्जा सन्यन्त्रों की समस्या पर भी प्रकाश डाला है। इस प्रक्रिया में लाभांश बढ़ाने के लिए लागत में कटौती की जाती रही है, जिससे ऐसी दुर्घटनाओं को न्यौता मिला है। टेप्को (TEPCO) (टोक्यो इलेक्ट्रिक पवार कंपनी) तो इस काम में प्रसिद्ध रही है रख- रखाव में कटौती कर लाभ बढ़ाना ही उनका लक्ष्य रहा है!

आईडीऐन: इस दुर्घटना ने किन मानवीय मुद्दों को प्रभावित किया है?

आरजे: इसका आकलन करने का कोई तरीका नहीं है। कई ऐसे परिवार हैं जिनमें रहने या दूर जाने अथवा स्थानीय भोजन खाने/न खानेके विषयों को लेकर तलाक हो गए। संदूषण के कारण कई स्थानीय बच्चे बाहर घूम या खेल नहीं सकते। कई बच्चों को डोज़ीमीटर पहनना आवशयक है (यह मीटर रेडियोधर्मी किरणों की चेतावनी नहीं देता, केवल मापता है, ताकि बाद में इनका अध्ययन किया जा सके) और बच्चे संदूषित होने की भावना के साथ बड़े हो रहे हैं। जिन परिवारों के बच्चे दूर चले गए उन्हें बदमाशी व भेदभाव के अनुभव पेश आए हैं। बहुत से लोगों को यह पता ही नहीं है कि वे रेडियोधर्मी किरणों के शिकार हुए हैं या नहीं, परंतु इतना उन्हें अवश्य पता है कि उनसे कई बार भिन्न विषयों पर झूठ बोला गया है, जैसे कि वे अपने घरों में लौट पाएंगे या नहीं, रेडिधर्मिता के खतरे क्या हैं या नाभिकीय बिजली के क्या लाभ / हानियाँ हैं।

रेडिओधर्मिता से संदूषित लोगों के बीच काम करने का विश्व भर का मेरा अनुभव कहता है कि ये सभी द्वितीय श्रेणी के नागरिक बन कर रह जाते हैं। उन्हें बहिष्कृत किया जाता है, उनसे झूठ बोला जाता है, उन्हें मेडीकल टेस्टों एक लिए शोषित किया जाता है, जबकि कोई सूचना उन तक नहीं पहुँचती और जीवन भर के लिए उन पर संदूषित होने का ठप्पा लग जाता है। इस प्रकार उन्हें वे सब साधारण अधिकारों से वंचित कर दिया जाता है जो समाज के किसी अन्य सामान्य व्यक्ति को उपलब्ध होते हैं।

आईडीऐन: अब नाभिकीय अस्त्रों की ओर। नाभिकीय अस्त्रों से लैस देशों ने वर्षों से ऐसे टेस्ट ओशियानिया या उत्तरी अफ्रीका के मरुस्थलों में किए हैं, न कि लंदन या पेरिस के निकट। यह तो एक असाधारण दुष्प्रयोग है, और इस विनाश के लिए इन देशों को कभी उत्तरदाई नहीं ठहराया गया…

आरजे: मेरा मानना है कि नाभिकीय टेस्ट सैन्य उपनिवेशवाद के समान हैं। नाभिकीय शक्तियाँ अपने सैन्य साम्राज्य के दूर-दराज़ वाले इलाकों में नाभिकीय टेस्ट कर वहाँ के लोगों को संदूषित करती हैं, ऐसे लोग जिनके पास अपनी सुरक्षा के लिए कोई राजनैतिक शक्ति या एजेंसी नहीं होती। जैसा कि सदा होता आया है, उपनिवेशक की इस शोषण के लिए कोई ज़िम्मेदारी नहीं तय की जाती। यह उपनिवेशक का उपनिवेश के प्रति शोषण ही है।

जब हम उपनिवेशावाद के इतिहास को देखते हैं तो पाते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य ने दास व्यापार से अर्जित सारी राशि हड़प ली और जब फ्रेच हेती से हारे तो इस हानि के लिए उल्टा हेती को ही हर्जाना देना पड़ा! नाभिकीय शक्तियों के केस में भी या प्रभुत्व चलता आया है और पुरस्कृत भी होता आया है। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा सभा को ही ले लीजिए, इसके पाँच स्थाई सदस्य पहले पाँच नाभिकीय देश हैं! नाभिकीय अस्त्र हासिल करने से उन्हें छोटे देशों पर स्थाई वीटो मिल गया है। नाभिकीय टेस्टिंग से हुए संदूषण के कारण मारे गए या प्रभावित लोगों के उनकी हानि के लिए को न तो कभी कोई स्वास्थ्य सुविधा या मुआवजा मिला है, और ना ही ज़मीन और खाद्य संसाधनों की क्षति के एवज़ में कोई भरपाई। यह अपराध ही तो है !

आईडीऐन: आप हिरोशिमा में रहते व काम करते हैं, उन दो में से एक शहर जिन्होंने नाभिकीय अस्त्रों से भारी क्षति उठाई है। ऐसे खतरों के बावजूद अमरीका से लेकर पाकिस्तान तक सभी नाभिकीय ताकतों ने 30,000 से अधिक नाभिकीय अस्त्र तैयार कर लिए हैं जो इस धरती को कई बार उजाड़ने हेतु काफी हैं। तब भी यहाँ कोई कोई स्तंबित नहीं है। यह आलस्य अनभिज्ञता है या नियतिवाद?

आरजे: दोनों ! अधिकतर लोग नाभिकीय अस्त्रों के बारे में सोचते तक नहीं। फुकुशिमा दुर्घटना होने तक लोग नाभिकीय ऊर्जा के बारे में भी नहीं सोचते थे। अधिकतर लोगों के लिए नाभिकीय अस्त्र दूर की चीज़ हैं वे नहीं जानते ये कैसे काम करते हैं या उन्होंने इसे कभी देखा भी नहीं है; जैसा कि कवि जान कनाडे ने कहा अधिकतर लोग नाभिकीय अस्त्रों को कथाओं में सुनते हैं और इनमें से अधिकतर कथाएँ होती हैं हालीवुड की फिल्में, जहाँ इन अस्त्रों के कोई भयानक प्रभाव नहीं दर्शाए जाते (एलियंज़ और एस्टरायड को मार गिराने के अतिरिक्त)।

परंतु एक सच यह भी है कि बहुत से लोग सोचते हैं कि वे नाभिकीय अस्त्रों के विषय में कुछ नहीं कर सकते। ये अस्त्र नाभिकीय शक्तियों की राजनीति में कभी विचार के लिए भी नहीं उठते और बड़ी सैन्य शक्तियों में यह सबसे नीचे कहीं गहरी सुरक्षा में दबे रहते हैं। और यहीं मेरा मानना है कि यह अस्त्र भंडार सबसे भेद्य हैं। जैसे-जैसे धानढ्य राष्ट्रों का अंत हो रहा है, हर वर्ष नाभिकीय अस्त्रों पर होने वाले बिलियनों डॉलर का खर्च प्रश्नों के घेरे में आने लगा है। हालांकि बहुत कम ही होता है कि लोग इन्हें अवांछनीय मानने लगे क्योंकि उन्हें लगता है कि इनसे वे ताकतवर राष्ट्र बनते हैं और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित होती है।

आईडीऐन: क्या आप सोच सकते हैं कि जैसे आप बचपन में नाभिकीय विनाश से भयभीत थे, ऐसा ही कोई बच्चा आज ईरान, कोरिया भारत या पाकिस्तान में होगा?

आरजे: हाँ, मैं ऐसी कल्पना आज की दुनिया में भी कर सकता हूँ, उदाहरण के लिए कश्मीर में, जहाँ आज भी नाभिकीय अस्त्रों से लैस भारत व पाकिस्तान की सेनाएँ आमने सामने हैं। पर मुझे लगता है आज यह अनुभव थोड़ा अलग होगा। आज के बच्चे जो समुदाय या घर पर सुनते हैं, उसके अनुसार ही मानसिक चित्र बनाते होंगे। जब मैं छोटा था तो इसे स्कूल प्रणाली का भाग बना दिया गया था, मुझे इसकी कल्पना नहीं करनी पड़ी– मुझे इस युद्ध के बार में सोचने का प्रशिक्षण दिया गया।

*जूलियो गोडोय एक खोजी पत्रकार व आएडीऐन के सम्बद्ध वैश्विक संपादक हैं। उन्हें उनके काम के लिए कई वैश्विक पुरस्कार मिले हैं, जैसे कि हैलमैन हैम्मेटट मानवाधिकार पुरस्कार, यूएस सोसायटी ऑफ प्रोफेशनल जर्नलिस्ट्स द्वारा दिया गया ऑन लाईन खोजी पत्रकारिता के लिए सिग्मा डेल्टा ची पुरस्कार और उनकी रिपोर्टों मेकिंग अ किल्लिंग: द बिजनेस ऑफ वार और द वॉटर रिसोर्सिज़: द प्राईवटाईज़ेशन ऑफ वॉटर सर्विसिज़ के सह लेखक के रूप में ऑनलाईन न्यूज़ ऐसोसिएशन व यूएससी स्कूल ऑफ कम्यूनिकेशन की तरफ से एंटरप्राईज़ जर्नलिज़्म का ऑनलाईन जर्नलिज़्म अवार्ड [आईडीएन — इन डेप्थ न्यूज़ नवंबर 27, 2013]

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